विवेक ( हिन्दी कविता)

विवेक 

बुद्धि   ने  पूछा   विवेक   से 
तुम   रहते   कहां   हो  भाई 
मैं   तेरे    पीछे    ही   रहता 
बस  तुझे  देता नहीं  दिखाई 

        जब  भी तुम्हें  उलझते  देखूं 
        या फिर चलते उलटा  सीधा 
        जिह्वा   पर  मैं  बैठ   तुम्हारे 
        लगाम   सदा  खींचता रहता 

बुद्धि  की  गति  अनंत  अपार 
कभी यहां  कभी समुन्दर पार 
विवेक उसे  रहता  सिखलाता 
स्थिर  बुद्धि  ही  रण   जीतता 

        बुद्धि  विवेक  यदि  साथ चलें 
        दुर्गम राह  बन जाता  आसान 
        दिशा  भटकता  नहीं है मानव 
        भेद  लक्ष्य   बन जाता  महान 

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास 
पांडिचेरी 17-09-2019

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