बसंतीक झूला ( मैथिली लघुकथा)



चान सनक मुंह आ हरदम खिलल खिलल। जेना बसंत अपन सम्पूर्णता सं ओकरे मुंह पर डेरा खसा देने होथिन्ह! तैं पिता नाम राखि देलखिन बसंती। वैह नाम रहि गेलै। बसंती के एक्केटा सख। झूला झूलब। पिताक दुलारी लै अंगने मे गाछक डारि पर झूला टंगा गेल।बसंती त' झूला झूलै लय बताहि। भोर सांझ, स्कूल जाय सं पहिने आ एलाक बाद झूला पर जा बैसै। माय तमसाथिन मुदा के मानैया।
बियाह भेलै आ पति संगें शहर मे रहय लागल ! दुनु गोटे विचारि क' एकटा दू बी एच के बला फ्लैट खरीद लेलैथ।चालिस हजार इ एम आइ। घरक खर्च चलव' मे कनि किफाइते करय पड़ैन्ह!तैयो बसंती बड्ड खुश! बसंती के त' जेना पांखि लागि गेल होइ। कमलेशो अह्लादित। स्वप्न सुंदरी सनक पत्नी ताहि पर सं नव घर। अति उत्साहित रहै छलाह दुनु गोटे।
                  आइ शनि रहै आ कमलेश के छुट्टी रहनि। बसंती कमलेशक पसिन के मुगलई परोठा जलखई मे बनबैत रहथिन। पाछू सं कमलेश आवि हुनका पंझियबैत पुछलखिन,” हमर पसिन के त' एतेक मान, कनि अपनों पसिन बताउ ने”। "हमर कोन पसिन। हमरो यैह नीक लगैया,” बसंती कहलखिन।
“अच्छा इ कहू घर भ' गेल, सजियो गेल। आव अहांक की अभिलाषा अछि ”,  कमलेश पुछलखिन।“ हमर कोन अभिलाषा ! सबटा त' अहां पुराइये देलहुं” बसंती बजलिह। “ तैयो बाजू ने” कमलेश बाहु पाश के कसैत पुछलखिन।बसंती के मुंह लला गेलैन्ह आ अपना के छोड़वैत बजलिह, “ हमरा लै एकटा झूला टंगवा दिय' बालकोनी में।“ 
दू मास बीत गेलै। आइ आफिस सं घुरै काल कमलेश झूला के एकटा गाड़ी पर लदवा घर ऐलाह। झूला लागि गेल। बसंती के झूला पर बैसा कमलेश डोरी खिंच' लगलैथ। आनंदक सीमा नहिं। कमलेश बसंती के कान लग अपन मुंह ल' जा क' पुछलखिन, “ हमर अभिलाषा कहिया पूरा हेतै”? बसंती लजा क' घर मे भगली आ पति के कान में कहलखिन,” आठ मासक बाद”! दुनू नाच' लगलाह!

डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,13-07-2020

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