संस्मरण ( अपना आदमी) हिन्दी
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वर्ष 1986। महीना आक्टूवर । तारीख 18। मुझे ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के माध्यम से ICSSR ( Indian Council of Social Science Research, New Delhi) ने देश भर में घूम घूमकर मेरे रिसर्च से सम्बन्धित पढ़ाई और सामग्री इकट्ठा करने के लिए स्कालरशिप दी थी। 27साल का देहाती,अभाव में पला, मैं एक संकोची उत्साही एवं संतोषी प्रबृति का युवक था। अनुभव तो कुछ था ही नहीं। मेरे बड़े भाई श्री आमोद जी ने दिल्ली की टिकट कटवा दी।18 ता. शनिवार को पुरानी दिल्ली पहुंच गया। वहां से एक आटो से नई दिल्ली स्थित आई.सी.एस.एस.आर भवन जो मंडी हाउस के पास है, दोपहर के करीब एक बजे पहुंच गया। गेट पर एक सिक्युरिटी खड़ा था । मुझसे सारा कुछ जानकर वह पहले तो हंसा फिर कहने लगा,” आज शनिवार है और कल रविवार। सोमवार को ही आफिस खुलेगा । आप उसी दिन आइये”। मैं तो अवाक! अव क्या करूं। मेरी बहुत विनती करने पर उसने मुझे एक अधिकारी से फोन पर बात करायी । उस अधिकारी के झिड़की ने तो मेरी सिट्टी-पिट्टी ही गुम कर दी। उसने जोर से डांट कर कहा “ सोमवार को नौ बजे आइये । उससे पहले कुछ नहीं किया जा सकता!!
मेरी आंखों के सामने जैसे अंधेरा छा गया । मेरे तीसरे बड़े भाई का साला दिल्ली में ही किसी औफिस में एडहाक कर्मचारी थे। भैया ने उनका नम्बर दे दिया था । दुर्भाग्य ! वह भी उनके आफिस का नम्बर निकला। अव क्या करूं । पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास एक धर्मशाला (लक्षमी धर्मशाला शायद) पर नजर पड़ी थी। मन में कुछ भरोसा पनपा और एक आटो लेकर वहीं पहुंच गया। जेब तो आधा खाली हो चुका था । एक आदमी से पूछकर धर्मशाला के आफिस में पहुंच गया। कुछ निम्न वर्ग के कर्मचारी बैठे थे। मुझे घूर घूर कर देखने लगे जैसे मैं कोई चोर उचक्का होऊं। बहुत समझाने पर उन्होंने बस इतना कहा कि चार बजे आओ। मैनेजर साहब आएंगे, उनसे ही कहना।
बहुत भूख लगी थी । बगल में ही एक होटल था । जितना चावल हम लोग थाली में कुत्ते के लिए छोड़ देते हैं, बस उतना ही चावल, चार चम्मच के बराबर दाल और थोड़ी सब्जी। पूछने पर पता चला कि वह पचपन रुपये का था! पहली वार अनुभव किया कि जेब खाली होते देख पेट कैसे भर जाता है! खायर होटल से निकलकर फिर स्टेशन के बाहर वाले बरामदे में बैठ गया। चार बज गये! उम्मीद की डोरी थामे धर्मशाला पहुंच गया। जमींदार के पोज में मैनेजर एक दीवान पर बैठा था और एक आदमी से बात कर रहा था। मैं ने अपना नाम और आने का मकसद बताया । उसने छूटते ही पूछा,” ये रिसर्च क्या होता है?” समझाया लेकिन वह न समझना चाहता था और न समझा। उलटे चोर उचक्का तक कह दिया। मैं ने भी दबे मुंह जबाव दिया। परिणामस्वरूप मुझे दरवाजा दिखा दिया गया ।
अव क्या करूं । कहां जाऊं ? एक दो होटल में पूछा तो अकेले रूम नहीं देता है कहकर वापस कर दिया या पांच सौ छ: सौ रुपये एक दिन का मांगने लगा। उतने रुपये तो मेरे जेब में अव थे भी नहीं। आई.सी.एस.एस.आर ने खाने, ठहरने,आदि का जिम्मा लिया था । इसलिए ज्यादे पैसे लेकर नहीं आया था। फिर से स्टेशन की सीढ़ियों पर जा बैठा। शून्य में ताक रहा था । दिल रो रहा था लेकिन आंख सूखे थे। अंधेरा घिरने को आया। बेचैनी बढ़ी। ब्रीफकेस उठाया और चल दिया। कहां? पता नहीं ।
बगल के फुट पाथ पर एक पेड़ के नीचे कुछ लोग एक ठेले वाले से ले लेकर चाय पी रहे थे। अनायास कान में “ मैथिली” भाषा के शब्द गूंजे। मुझे लगा कि भ्रम हुआ है। कुछ क्षण के लिए ठहरा । पुनः वैसे ही शब्द ! लगा भूखे प्यासे बछड़े को उसकी मां बुला रही है ! मैं भी ठेले वाले से एक कप चाय देने को कहा। वह भी मैथिली भाषी था और मैं भी। वहां खड़े सभी लोग मैथिली भाषी ही थे। मेरी खुशी की सीमा नहीं रही। जब सब कुछ बतलाया तो उस चाय वाले ने मुझसे कहा आप चिंता नहीं कीजिए। मैं सारी व्यवस्था कर दूंगा । आप तो अपने आदमी हैं । उसका नाम संतोष था और वह मधुबनी के पास रहिका का रहने वाला था। यहां दिल्ली में ठेला पर चाय बेचकर अपना और अपने परिवार का पेट पालता था। लगभग आठ बजे अपने साथ वहीं एक खुले मैदान में ले गया जहां कुछ छप्पड़ डालकर ढ़ावा जैसा बना था । सैंकड़ों मजदूर जमीन पर बैठकर खा रहे थे । मैं ने भी वहीं बैठकर रोटी और पालक पनीर की सब्जी खायी। ईमानदारी से कहता हूं उतना सवादिष्ट पालक पनीर फिर आजतक नहीं खाया । संतोष ने ही पैसे दिये। मेरे बढ़े हुए हाथ उसने जबड़न पकर लिये ।मेरी सूखी पलकें भींग गई।
संतोष फिर उसी धर्मशाला में ले गये और एक खटिया दिला दिया । मैं दो रात वहीं सोया और सोमवार को आई. . सी. एस.एस.आर के आफिस जाने के लिए संतोष ने मुझे बस में चढ़ा दिया। मेरी मुलाकात संतोष से फिर नहीं हुई लेकिन मेरा रोम रोम उनके प्रति कृतज्ञ है और रहेगा ।
डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,20-05-2020
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