क्षितिज को छूने आना प्रिय(हिन्दी कविता)
जहां कहीं हरियाली खेलें
झरनों के नीर झर झर बोलें
नदियां कल कल निनाद करें और
पक्षी कलरव कर खेलें कूदें
वहीं तुझे खोजूंगा प्रिय
मिल जाना तुम बादल बनकर
शीतलता की वर्षा करना
अदृश्य सूखे प्राण मेरे
जीवन पाकर पनप जायेंगे !!
जहां गुलाब सुरभि पसारें
कमल कुंड में हंस हंसनी
केलि करें और चोंच लडावें
मधु मास में झूला पर बैठीं
सखियां सब कोकिल बन जायें
कच्ची अमियां खा खा कर वो
मस्ती में लिपटें लिपटायें
प्रिय वहां भी मैं ढूंढूंगा तुमको
जीवन को ढूंढूँ जीवन बगिया में
प्राण से पुष्पित होती कलियों में
यदि कहीं तुम नहीं मिली प्रिय
क्षितिज को छूने आ जाना तुम
वहीं तुम्हारा राह देखूंगा
फिर आलिंगन में बंध जायेंगे !!
डॉ. प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,18-02-2020
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