उड़ीसक घर (मैथिली बीहनि कथा)

उड़ीसक घर
     (मैथिली बीहनि कथा)

ललियाक ससुर शशी बाबू बड़ पिंगल ! जतय जेताह, आफन तोरि देताह! लोक सब कनि हंटले रहै छल हुनका सं । दान दहेज कम भेटलन्हि,तेकर खौंझी! ! रतन जी  मोन मे किछु सोचलक! छल त' बालके मुदा रिश्ता मे समधि  आइ फेर आवि गेलखिन।
खुआ पिया क' एकटा पलंग पर विछावन भेलैन्ह। मुसहरी आ कांटी लागल डोरी झोड़ा मे सं निकालि रतन जी के देलखिन! मुसहरी टंगा गेल। शशी बाबू- “ समधि बहुत धन्यवाद। बड्ड सेवा कैलहुं! खाली जंतलहुं नहिं” । “ भोर हुअ' दियौ ! सख पुरि जैत!” एतेक कहि रतन जी घर गेलाह!
अधो घंटा नहिं भेलै कि शशि बाबू के उड़ीस कटनाइ शुरू कैलकन्हि! इम्हर मारैथ त' ओम्हर कटैन्ह आ पाछू रगरथि त' आगू लोहछबनि! आधे घंटाक बाद टौर्च बारि देखलाह त सौंसे मुसहरी पर उड़िसे उड़ीस!
भिनसरे झोड़ा- झपटा लेने भगलाह! रतन जी चिकरिते रहि गेलैन्ह,” समधि जंता क' जैब! मुदा के सुनैया!

डॉ. प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,
( पुरस्कृत बीहनि कथा)

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