कत्त पहुंचलहुं (मैथिली बीहनि कथा)

कत' पहुंचलहुं
          ( मैथिली बीहनि कथा)

कोन टिशन छियै? ज्योति अपन पप्पा आशीष सं पुछलकै। बरौनी जंक्शन छियै , आशीष कहलखिन। पापा गाड़ी चलतै ने त' हमरा धकैल क' खसा देब। आव अहि जीवनक कोन मोल!
पथरायल आंखि सं ज्योति कहलकै। “ चुप न! कत्ते बजबैं ! लोक सब सुनैत हेतै!” पापा हम अहांक आश तोड़लहुं आव अहां हमर सांस तोड़ि दिय' ! हमर वैह प्रायश्चित !
आव तों एक जान नहिं छैं बेटा। एक संग दू जान जेतै । ओकर कोन दोष ? 
नहिं पापा एक्के झोंक मे खिस्सा खतम क' दियौ। हम कोन मुंह सं गाम जैब।
ई त' पहिले ने सोचितै बेटा। एतेक नीक इंजीनियर ! दरमाहा… !! नौकरी… !!!
लोक के नहिं चिन्ह' अएलहु ! हमरो सब के त' कनिञों कहितै । दीपक संगें एक्के घर मे बिन ब्याहले रहय लगलै ! तोरा सन सन दू टा आर लड़की के ओ धोखा द' चुकल छै। तों कोना ओकर मिठगर बातक जाल मे फंसि गेलैं !
गाड़ी गामक टिशन पर रुकि गेलै !

डॉ.प्रमोद कुमार
पांडिचेरी

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