भाग्यक खेल (मैथिली बीहनि कथा)
भाग्यक खेल
(मैथिली बीहनि कथा)
कलायवाणी आइ बड्ड खुश छै । ओकर बेटा शणमुगम के आइ दरमाहा भेटतै। बड्ड मोश्किल सं ओकरा पढौलकै। चारि घर मे चौका बर्तन करै छै। उमेर त' पैंतिस चालिस के हेतै मुदा लगै छै साइठ-सत्तैर के । भुखल पेट बेर खसै तक काज करै छै। गैस्ट्रिक शरीर के खखोरि देने छै। रहि रहि बिमार पड़ि जाइत छै। तैयो एकटा आश छलै ! बेटा के पढ़बै छी । नौकरी करत । सब दुख दूर भ' जायत। तहिं देह के घिसिया क' काजक घर तक पहुंचा दै । भोर-सांझ !
बिन ब्याहने एगो मजदूर सं प्रेमक परिणाम छियै शणमुगम । मुरगादास तीने बर्षक बाद कत' गेलै से कलायवाणी के किछु बुझल नै छै। लोक सब कहै छै जे बगले के शहर मे दोसर कनिञां के संग रहै छै । शणमुगम बी.एस. सी कम्प्युटर साइंस स' केलकै आ तुरत्ते एगो ओही शहर के आई टी कम्पनी मे नौकरी भेट गेलै। पन्द्रह हजार महीना । कलायवाणी के त' जेना मोन मे मयूर नचैत होइ। की की ने सोचने अछि। खोपरी के ठीक करैब, बेटा के कहबै एगो मोटर साइकिल किन लेत। फेर ओकर बियाह। कनिञां बच्चा….!
राइत के दस बाजि गेलै। शणमुगमक कोनो पता नहिं। अनेक तरहक आशंका सं घिरल कलायवाणी पटिया पर ओंघरा गेल। निन नहिं भेलै। फोनों कहां छै ! भोर भेलै। नव आशक नव किरण केर संग उहो खोपड़ी स' बाहर निकलल। देखैया जे कुमार वेलू ओकरे दिश आवि रहल छै। लग आवि कुमार वेलू कहलकै, “ काकी ! शणमुगम एगो लड़की सं प्रेम करै छै। दरमाहा भेटते ओ शनमुगम सं ए. टी. एम कार्ड सं सब पैसा निकलबा क' ल' लेलकै। तहिं शणमुगम लाजे नहिं आयल! हमरा दिया संवाद पठा देलक अछि। हे… रे… हमर भाग्य !! कलायवाणी कपार पिट लेलक !!!
डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी, 15-02-2020
Comments
Post a Comment