घैलक पानि (मैथिली कविता)

घैलक पानि

घैलची पर राखल
घैलक पानि मे
गामक माइट मे लेटाइत आ
जेठ बैसाखक रौद मे
बिर्रो संग नाचैत
पछवा संग खेलैत
अनेरे दूरे दरबज्जे दौड़ैत
बाबू आ भैया सं
माइर खाइ मे
जे आनंद छलै से कत्त सं लावी।
वर्षाक बुन्नी मे नहाइत
नवका पोखरिक घोंकल पानि मे
केराक थम्भ ल'
हेलनाइ सिखै मे
माय सं दू चटकन खा
चितकबरा भेल देह मे
नारिकेलक तेल हंसोतबाबय में
जे आनंद छल से कत्त पावी।
देह बूढ भेल
पोखरि इनार सुखि गेल
माय मरि गेल
गाम उजरि गेल
शहर मे बैस क'
याद पारि पारि कनै छी
की कहू
जीवैत छी कि मरल छी!

डॉ.प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,20-2-20

Comments