हे री गर्मी (हिन्दी लघु कथा)
हे री गर्मी
गर्मी....! हे री गर्मी....! सुनती हो!
क्या है! क्यों चिल्लाते हो?
वाप रे !एक तो गर्मी उसपर से इतना गुस्सा! भई आसमान पर क्यों चढी हो!
थोड़ा नीचे तो उतरो!
क्या कहा, “नीचे उतर जाऊँ! “ मैं नहीं उतरने वाली। तुम्हें जो करना है करलो। “
ठीक है भाई! पर कुछ तो दया करो! इतना निर्दयी कोई होता है क्या!
एक काम करो!
क्या…क्या... कहो न!
तालाब में जाकर नहा लो।
तुम भी मजाक करने लगी। एक तो तालाब नहीं है,
और होगा भी तो तुम्हारी कोप दृष्टि के कारण उबलता होगा।
तो एसी कूलर में बैठ जाओ न!
देखो परेशान करना है तो करो लेकिन मजाक तो न उड़ाओ।
तो हाथ का पंखा ले आओ न!
आइडिया तो ठीक है लेकिन अव उसे कहां खोजूं !
ऐसा करो, तारबूज ले आओ। खाओ और मुझे भगाओ।
ठीक है!
खाया पिया हजम हुआ
गर्मी थोड़ा कम हुआ।
प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास पांडिचेरी 10-05-2019
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