घर में बैठ हवा (हिन्दी कविता)
घर में बैठ हवा
ऐ हवा
तूं चली कहां
घर में बैठ
बाहर दूषित जहां
जाने कहां कहां तूं जाती है
किस किससे मिल आती है
कैसे कैसे दोस्त हैं तेरे
पहले धूआं और गर्द ही लाती थी
अव तो कीटाणु भी लाती हो
फिर नाक में घुस
शिराओं तक पहुंच जाती हो
कहती हो
सांसें चलाने आती हूं
मैं तो समझूं
घूम फिर कर
धड़कनें बढ़ाने आती हो
मेरी मानो
मेरी ही तरह
घर में ही रहो
डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी, 01-05-2020
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