रुक न ! (मैथिली बीहनि कथा)
जीवन भरि दुखिये रहलाह आ नाम छनि सुखी बाबू ! धन बीतक कमी नहिं आ तहि पर सं ब्लौक में कर्मचारी ! भगवान धिया- पुता नहिं देलखिन ! पिछला साल चारि धामक यात्राक रट लगवैत लगवैत पत्नी स्वर्ग सिधारि गेलखिन ! सरबेटा के बुढापाक लाठी बना लेलखिन !
सुखी बाबूक एकटा आदति रहनि। सब राति केबार बंद क', मोटरी खोलि, रुपैया गनै छलखिन। एसगर डर लागनि तैं मदना के अपने बगल मे सुतबय लगलखिन!
छोट बालक! गरीबिक माड़ल ! जे किछु बिकाय अबै कहैन,” पिसा किन दिय' ने ! सुखी बाबूक जबाब, “ रुक न ! तावे बेचिनिहार चलि जाइ। काल्हि बरफ बला ऐलै, सुखी बाबू नहा क' गेंठ मे रुपैया सेरियबैत रहथिन कि मदना दौड़ल-दौड़ल ऐलै आ कहलकैन्ह, दूटा रुपैया दिय' त' !
सुखी बाबू हांय-हांय क' रुपैया सम्हार' लगलाह ! पुछलखिन, " की करबीही रुपैया ल' क' " ? हवा मिठाई किनबै, मदना कहलकै !अच्छा रुक न कनि ! ढ़ेका सेरिया लै छी ! हवा मिठाई बला चलि गेलै !
पड़ोस मे भोज रहै । दुनू गोटे खा क’ ऐलाह ! केबारक उपरको छिटकिल्ली लगा क' सुखी बाबू सुतलाह । आधा राइत मे मदना के पेट गुड़गुड़ाय लगलै ! उठेलकनि, कनि केबार खोलि दिय' । आदतानुसार सुखी बाबू कहलखिन, “ रुक न !” तीन बेर प्रयास कैलक मदना मुदा हरेक बेर वैह ज़बाब, “रुक न !
कतेक काल सम्हारितै बेचारा ! एक्के बेर पर..परा.. क' …..!
आब की कहथिन सुखी बाबू ! हुनको उल्टी हुअ' लगलनि ।
डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,06-02-2020
Comments
Post a Comment