मंदिर (मैथिली कविता)
मंदिर
प्रेमक प्यास मे पागल पथिक व्याकुल, रन वन घूमैया
मंदिर मस्जिद गिरजा गुरु द्वारा ओ माथा टेक मरैया
नदी झील झरना नहिं छोड़लक देखलक खत्ता ओ खधिया
व्यथित भेल बैसल अछि पथ पर पथिके सं राह पूछैया ।
हे तरूवर! अहां प्रेम मगन झूमै छी भय हरियर कंचन
अहीं बतावी कतय भेटत हमरा प्रेमक घर ओ आंगन
पक्षिराज के दृष्टि अनंत छनि अहीं कहू हे ज्ञानी ध्यानी
घुमि घुमि थाकि गेल मानव ककरा प्रेमक मंदिर जानी।
हे सठ मानव कतय घूमै छी पागल छी अहां भ्रमर सन
पुष्प पुष्प पर बैस पुछै छी प्रेम कहां आ कहां प्रेमक वन
कस्तूरी मृग मे बसै जानै नहिं ओ मूढ़ निश्छल अधीर
प्रेम बसैत अछि मनुज केर उर मे मंदिर हुनक शरीर ।
प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
पांडिचेरी 07-09-2019
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