रेखा और कर्म (हिन्दी कविता)

रेखा और कर्म 

रेखाएं खींच दी तुमने 
उसकी हथेली पर 
और हंसा! 
अव जायेगा कहां? 
हह्! यह बेचारा कठपुतला! 
रेखा लांघ पायेगा! 
हंसा गर्व से फिर 
रेखाओं के साथ 
रस्सियां भी बांध दी 
जाल भी बिछा दिया 
फिर जोर से हंसा! 
जितना छटपटायेगा
उलझता ही जायेगा 
मेरा बेचारा कठपुतला! हा हा हा!!! 
मैं मदारी 
वह खिलाड़ी 
बड़ा मजा आयेगा !

पर हे विधाता !
आज तेरी हंसी कहां गई 
देख कठपुतले को 
कब उसने रेखा लांघी 
क्या तुमने देखा नहीं 
या आंखें मूंद ली अपनी 
कर्मयोग सीखा है उसने 
रेखाएं लांघता है 
फांदता है 
तेरी रेखाओं की जाल को 
तार तार करता है 
तुम देखते हो 
मुस्काते हो 
फिर  उसे ही बुलाते हो 
राम और कृष्ण बनाते हो! 
यह भी मेरा ही बनाया तमाशा है 
कहते नहीं  अघाते हो। 

प्रमोद कुमार 
पांडिचेरी, 07-11-2019

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