रस हीन कोरोना (हिन्दी कविता)
रसहीन कोरोना
रोती हैं सड़कें
रोती हैं संकरी गलियां
और दूकानों की सीढ़ियां
रेलिंग खड़ा उदास है
निराश उसके खम्भे
आती थीं कितनी तितलियां
उनके कोमल हाथ
फिसलते थे मेरे देह पर
काश ! वह सिहरण लौट आतीं
वे देखती थीं साड़ी
या कभी सलवार सूट
दूकानदार तो बेचने में मग्न
मैं तो कुछ और ही देखता था
कभी उनके सूर्ख होंठ
या कपोल के गड्ढे
घंटों साड़ियों को उलटना पलटना
दूकान के शीशे का तो
और भी बुरा हाल है
गुमान में रहता था हरदम
रोज ही नज़रों से गुजरती थीं
कितनी सुन्दर छवियां
जानता कि ऐसा होगा
तो घर ही क्यों न बना लेता दिल में
और बिठा लेता उन्हें
न जाने अव वो दिन कव आयेंगे
जल बिन मछली सा
छटपटा रहा है
लिपिस्टिक का बक्सा और
उसमें पड़ी रंगीली स्टिक
लगाती थीं वो और
रोयें खड़े होते थे मेरे
क्या वो दिन आएंगे फिर से !
पूछती हैं सूनी सड़कें
और रोती हुई गलियां
जब रौनक नहीं कहीं पर
तब क्या है उनका जीना !!!
डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,25-04-2020
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