लाल बहादुर (हिन्दी कविता)

लाल बहादुर 

गुदड़ी में  जन्मा एक बालक 
दृढ़ता और ईमानदारी साथ लिये 
पैसा नहीं,  कोई बात नहीं 
कठिनाई को तैर कर पार किये। 
हिम्मत का राजा था बालक 
आये अनन्त पत्थर आगे 
कर किनारे आगे बढ़े 
बढ़े बढ़ते गये, सीना ताने 
सबसे ऊंची कुर्सी आसीन हुए 
बिपदा पीछे लगी हुई थी 
देश में  ऐसा अकाल हुआ 
क्या बच्चे क्या युवक बूढ़े 
दाने दाने को तरस रहे थे
अमरीका ने तभी चाल चली  
गेहूं भेजना बंद किया
चिंता नहीं उपवास करूंगा
भूख से देखो ऐसे लड़ुंगा 
जय जवान जय किसान का नारा दिया 
सोये शेर के रगों में  जैसे 
ताजा खून दौड़ा दिया 
दुश्मन ने सीमा लांघी और 
पैटन टैंक का मुंह खोल दिया 
ऐसा वीर लाल था अपना 
सेना का आह्वान किया 
क्षण में  पैटन टैंक उड़ा 
दुश्मन का कपड़ा गीला हुआ और 
उसके आका का भी दिल दहल उठा 
शांति शांति करके वह पापी 
प्रपंच रचा और
भारत के लाल का घात किया 
कद छोटा था, काम था ऊँचा 
भारत का भाल ऊँचा किया 
मरे राष्ट्र के रग में जैसे 
चिंगारी संचार किया 
कृतज्ञ राष्ट्र का नमन तुम्हें है 
गर्व से माथा ऊँचा करके 
नित गीत नया बनायेंगे 
तेरी गाथा हम गायेंगे। 

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास 
पांडिचेरी 02-10-2019

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