दोकान (मैथिली कविता)
दोकान
जीवन लय की चाही
बस दू घड़िक मुस्कान !
एतवे लय लोक खोलि लेने अछि
केहन केहन दोकान!
कतहु चक्कू छुरी बिकाइया’
कतहु बिकाइछै माछ
में में करैत कातर बकड़ी
नहिं बँचै छै जान!
ननमुन सभ के उठा ल’ जाइया'
लाखों करै या' मांग
करि संहार एक बालक के
लावय दोसरा लय मुस्कान!
आई धिया के लुटि जाय’ सबकिछु
सड़क हो कि मकान!
नहिं जानि ककरा मुख पर
पसरै केहन मुस्कान!
क्यो मारै छै शब्द वाण सं
क्यो मारै छोड़ि तीर कमान
छद्म वाण त’ चलवै सभ क्यो
शिष्टाचारक नहिं कोनो मान
हे शांति दूत अहां आउ फेर सं
पुछियौ गली कुची मे घुमैत
अंगुलिमाल सं
ककरा लै 'ऊ' चला रहल अछि
ई घृणित दोकान!
की ओकर बच्चा सभ
बुझियो -सुझि क'
करतहि ओकरा पर अभिमान!
प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
गुरगांव (हरियाणा), 07-06-2019
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