बताह (मैथिली कविता)
बताह
दू डेग आगू ,एक डेग पाछू
नाइच लै यै ,चारु कात ओ
गुन धुन गुन धुन ,की जपैया’
लटपट लटपट कियै चलैया'
धोती चिथरी, फाटल बेमाय
अस्थिपंजर, सटकल पेट
मांगै ने भोजन आ ने पाइन
ने कोनो परिचय आने पात
ने कोनो घाट आने बाट
जे किछु दै छै, खा लै छै
कुकुर बिलाई,संग बैसा लै छै
ने चोरी आने डकैती
ने कोनो छिना जोरी
नहिं ब्यभिचार,नहिं अत्याचार
नहिं कोनो बर्तन आने वासन
छै ने ओढ़न आ ने पहिरन
नहिं कोनो कुटिया आ ने आश्रम
नहिं बोखार आने खांसी
नहिं बुझै जार आने गर्मी
ई मूढ़ मानुष समझि ने पाबै
कियै ओकरा लोक कहै छै पागल
जे दिन राइत लूट,खसोट,ब्यभिचार मे लागल
ओकरा पदवी, नौकर चाकर
ने ओ लक्षमण राम के
ने मीरा घनश्याम के
अपने अन्त:मे खोजि रहल
अपनहिं सुख धाम के!
क्यो ज्ञानी आइ हमरा बुझाबै
दर्शन मे लागल ,पागल कहाबै!
घोर पापियो सभ पाग चढ़ावै।
प्रमोद कुमार उर्फ” नेहरू लाल दास “
पांडिचेरी, 13-03-2019
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