दर्जिक खगता (मैथिली कविता)

दर्जिक खगता 

हे यौ सुनै छी !
की भेल! 
एना कियै बेकल छी !
सुनू ने! 
हमरा  एगो दर्जी चाही 
अहुं ने.....!
बुरिलेले रहि गेलहुं! 
दर्जी त’ बौआयल फिरैया 
अहां तकने फिरै छी। 
त' कहू अहां के की बुझु हम!
अहां हमर बात त’ सुनु 
हमर छाती फाइट गेलै'
फाट बड़ चाकर छै 
दू बर्षक नेनाक संग....! 
नहिं बाजल जायत आव 
बड़का बड़का दर्जी सभ 
डिंग हंकने फिरै छलाहै 
कियो कहै छथि सूई नहिं 
कियो कहै छथि ताग छोट अछि 
चिल्ल पों गैंग त’ मौन ब्रत धारण कयने छथि 
क्यो नहिं भेटैया’ जे 
हमर छाती कनि सीव दितै 
‘ऊ’त’ बीस पचीस बरख लगौता 
तखन फैसला सुनौता 
फेर लटकौता ता धरि हजारों...... 
अहां के भुस्सा त’ भरय 
अविते होयत 
लिए’ भुस्से भरि क’ मारि दिय’
आव नहिं जीवल जैत! 

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास 
गुरुग्राम, 09-06-2019

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