कदिमाक तिमन (मैथिली बीहनि कथा)
कदिमाक तिमन
( ई लघु कथा सुनल- सुनैल बात पर आधारित अछि । अहि विषय पर पहिनहुं क्यो लिखने छथि कि नहिं से हमरा ज्ञात नहिं । हं शब्द हमर अपन छी ।)
विभूति बाबुक पेट कनि हरहरा गेल रहनि। पोखरि दिश सं अबैत छलाह कि एकटा अजगुत देखलन्हि। लक्ष्मीपुर बला पाहुन पड़ैल जाइ छथि ! दौड़तो छथि आ पाछुओ तकैत छथि ! तसर सिल्क के कुर्ता आ लाल धोती। बाटा बला एमबेस्डर जुत्ता ! जुत्ता सम्हारथि त' कोंचा ढ़ील आ कोंचा सम्हारथि त' ढेका ढ़ील ! तैयो पड़ाइते जाथि ! पाछू पाछू दू तीन गो कुकुरो खिहारने जाइ छलन्हि ! कोनों तरहें बिभूती बाबू हुनका लग पहुंचलाह, “ की भेल पाहुन ? एना कियै पड़ैल जाइछी “ , एतेक कहि जोर सं गट्टा धेलैथ !
नहिं नहिं हमरा जाय दिय ! हमर जान आफत मे फंसल अछि! जान छोड़ा क' भगलहुं अछि !
आखिर भेल की से त' कहू ! अहां घरक लवका जमाय छियै ! एना पड़ेवै त' …!
बड़ जिद कयला पर लक्ष्मीपुर बला पाहुन कहय लगलखिन,” गुलाब कका रहता त' हम नहिं रहब ! बिभूति बाबू अपन मुस्की दबबैत पुछलखिन, “ की भेल से त' कहू !”
यौ भैया,” हमरा कदीमाक तिमन नीक नहिं लगैया ! बारिक जैह कि कदिमाक तिमन बंटलक कि गुलाब कका हमरा आगू बैस गेला ! हम की करी ! सब भोजन शुरु कय देलैथ ! कदिमा देख हमर रोइयां ठाढ़ ! कोना खाउ ! चट दनी नाक मुनलहुं आ सब कदिमा उदरस्थ ! एकाएक गुलाब ककाक नजरि हमर पात पर गेलैन्ह !” जाह ! पाहुन के कदिमा नहिं परसलहुन ! केहन भुच्चड़ बारिक अछि ! पाहुनक पात पर भरि करछुल कदीमा ! हम की करितहुं ! देखलहुं जे गुलाब कका आन दिश ताकि रहल छथि कि चट द' कदिमा एक्के वेर में घोंटि गेलहुं ! गुलाब कका फेर देख लेलथि ! बारिक के चिकरलथि, “ हौ कदिमाक तिमन लाबह ! पाहुन के बड़ नीक लगै छैन्ह ! आ हम यैह ले वैह ले पड़ेलहुं !
डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी, 16-04-2020
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