स्मृति के पन्ने से

स्मृति के पन्ने से

कौन जानता था
वह निकल आयेगा
वही
कद्दू का फूल!
लोग संजोते थे गुलाब
या उसकी पंखुड़ियां
उनके पास दिल थे
मेरे पास दो हाथ दो पैर
और
कुदाल और कुल्हारियां
मैं ने संजोया कद्दू का फूल
अपने कितब में पन्नो के बीच
कद्दू के साथ ही
मेरे भी सपने बढ़ते थे
वह बढ़ता था
ईंच दर ईंच
और मैं अपनी आशा की तरह
मिलिमिटर में
वह बहुत बढ़ गया
फिर सपने में आया
कह गया
देख मुझे जल्दी बढ़ने की जिद ने
निशां मिटा दिया
तुम भी बढ़ना
लेकिन ज्यादे नहीं
नहीं तो तोड़ दिये जाओगे
मिट जाओगे
मेरी तरह!
मेरी निशानी
मेरा फूल संजोये रखना

डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,28-05-2020





Comments