सखी बहिनपा ( बीहनि कथा) (साविक के बात)

 

बहिना गइ! सखी के देखलहीयै’? नीलू पुछलकै। नहिं गइ! से कियै?”गीता कहलकै। छै एकटा बड़का बात! कोन बात गइ? कह न! 
कह न  बहिना। कहबौ कहबौ!  एना कियै अधीर होइछै।  
हमरा लगैया जे ऊ फूल के घर मे घुसल हेतौ।  जहिया सं फूल के बियाह भेलैया', हरदम ओकरे घेंट मे घेंट जोरने रहैया’ ! हमरा सभ के बिसरिये गेलै’! 
की खिट पिट होइ छै गइ चमेली, गुलाब? ओमहर सं अबैत शीला पुछलकै। भने तोहूं आवि गेलैं। आइ काल्हि सखी हरदम फूल लग बैसल रहै या’ !
गइ चमेली! आब तोहर सखी सियान भ’ गेलौ।  फूल स’ सिंगार पेटार सिख’ गेलौवा’! फूल आ सिंगार!   से की? नहिं बुझल छौ।  कहबैं तब ने! गई चमेली कह न!  तोहर सप्पत! 
सप्पत कियै दै छैं!  सुन। फूल के पाहुन बड़ रसिक! कहलखिन, “लोक के देखै छियै ठोढ़ लाले लाल! अहां के कियै ने अछि।  बस फूल लग अलता रहै।  ओही सं रंगि लेलकै। भोरे दुनू के देख क’ लोकके हंसैत हंसैत पेट फूलि गेलै। 
बहिनों कि कम छै! आब ओकरा जखन सं पता चललैया' जे ओकर होइ बला वर शहर मे नौकरी करै छथिन,  तहिये सं ऊ ऊंचका एंड़ी बला सेन्डिल पहिरै के अभ्यास क’ रहल छै। परसू त’ हमर कक्का बला खड़ाम पहिर चल’ लागल।  मुंहें भरे खसलै।  भाग्य सं हाथ पैर नहिं टुटलै। ताबत मे सखी अबैत देखेलै। 
लग अएलै त’ सब के एकाएक हंसी के फुहाड़ निकलि पड़लै।। बहिना ब्युटिफुल बनवै के फेर मे अगुलका सब केशे काटि लेने रहै। 

प्रमोद कुमार पांडिचेरी 
24-11-2019

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