उड़ने की इच्छा (हिन्दी कविता)

उड़ने की इच्छा

चिड़ियों को पंख पसारे 
उन्मुक्त गगन में  उड़ते देख 
मेरा भी मन 
उड़ने का करता है मां! 
वह कौन है जो 
रस्सियों में  बांधकर 
बंदरियों सा मुझे 
नचाता है! 
खिल खिल हंसती 
कूदती -फांदती 
बिचरती गलियों में  बस यों ही 
स्कूल से भाग बगिया में जाती 
पत्थर फेंक 
अमियां तोडती
कुछ खाती 
कुछ ऐसे ही फेंकती
सुबह शाम सैर को जाती
गली के कुत्तों से न डरती 
खेलती कबड्डी या पिट्टो
या फिर कित कित या फिर कंचा 
ऐसे  ही मैं बड़ी हो जाती 
दाना चुग चुग घर को लाती 
कुछ तुम्हें खिलाती 
कुछ अपने खाती 
क्यों जनमते बेड़ी पर गयी 
किसके हाथ में चाभी लग गई!

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
 पांडिचेरी 24-07-2019

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