गुलाब (मैथिली बीहनि कथा)

गुलाब
       (मैथिली बीहनि कथा)

एक रत्ती के छलैया' गुलाब। जेहने नाम तेहने रूप। बाप रघुआ पंजाब कमाय लेल गेलै से गेले रहि गेलै ! सब कहै जे ओत्तहि फेर सं घर बसा लेलकै !  दू-तीन गो धियो-पुता छै ! एत्त माय जेना तेना मजदूरी कय क' दुनू गोटाक पेट पोसै छलै। दस बर्ष भेलै। बड्ड जोर बाढ़ि आयल रहै! कमलाक बांध टुटि गेल रहै। बड़का बड़का रौह-भाकुर माछ ओहिना दहाई। अड़ोसी-पड़ोसी सब पकरि पकरि आनै आ गुलाबक माय के देखा देखा मुंह दुसै। गुलाबक माय सेहो माछ पकर' गेलै। एकटा बड़का भाकुर के पकरैत पकरैत अपनों भंसिया गेलै।
गुलाबक सब पांखि झड़ि गेलै !
दस वर्षक गुलाब आब गुलबिया बनि बदमासक पदबी धारण क' लेलकै। बोली लगै जेना बबुरक कांट होइ। सोझे देह मे धंसि जाइ। डरे सब ओकरा सं फराके रहै। सांझे घर मे छिटकिल्ली ठोकि लइ। एकटा पाकिट मे मेरचाइक बुकनी रखने रहै। जं क्यो ….! जहि घर मे माय काज करै ओत्तहि ओहो काज कर' लगलै। भगवान गरीब के सुन्दर कियै बनवै छथिन। मालिक के बेटा रतन ओकरा नुका नुका क' तंग केनाइ शुरु कय देलकै। सोचै जाइत त' एक्के अछि ।गुलाब गरीब छै त' की। काल्हि हमर सम्पत्तिक मैलकाइन त' वैह बनत ! 
एक दिन माय सं कहि देलकै, “ हम गुलबिया सं बियाह करब” माय कतबो समझेलखिन-बुझौलखिन मुदा ओ नहिं मानलकै। अंत मे हारि क' माय के हं कहय पड़लन्हि। कहलखिन,” गुलबिया के मना ले। ओ जं मानि जेतौ त' कोनो बात नहिं! 
सांझ भेले रहै। मनसुबा बान्हि चलि पड़ल रतन ! गामक सिमान सं सटले दोसर गाम मे गुलबियाक घर छलै। रतन नहू नहू केबार खटखटब' लगलै। गुलबिया कतबो पुछलकै मुदा कोनो जबाब नहिं भेटलै। दुनू मुट्ठी मे मेरचाइयक बुकनी भरि लेलक ! हौले सं केबर खोललक आ दनादन दुनू हाथे मेरचाइयक बुकनी रतन के आंखि मे झोंकि देलकै! रतन बाप बाप कय पड़ैल ! ई जानि रतन मायक मोन बड़ खुश भ' गेलन्हि। दिन मे रतन के माय गुलाबक आंगन जा कहलखिन्ह,” कनिञां ! मेरचाइयक बुकनी हरदम संगे राखब !
गुलाबक गाल सचमुच गुलाबी भय गेलै!

डॉ. प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,08-01-2020

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