शरद सुहावन (मैथिली कविता)
शरद सुहावन
चारि मास तक खेल खेला कय
कतहु झम झम कतहु रिम झिम
क्वारक उमस पसारि क’ सौंसे
करिया बदरा लौटलै गाम
मंद मधुर पछवा सिहकै छै
पंखा ए सी बन्द भय बैसलै
गृहणी बुनथि सुइटर टोपी
बूढ़ ओरियाबथि खुहरी करसी
नव जोड़ा के भाग छै जागल
सिंघार फुलक पथार छै लागल
ककरो गांठ मजगुत होइ छै
गेंदा गांठ के खोलि रहल छै
वर्षाक पानि पीव क’ सूरुज
नहूं नहूं ठंढ़ा रहलैया'
अलसा क’ आब देर सं जगतै
सुतियो ओ जल्दिये रहतै
माल जाल के रोइयां बढ़तै
कुकुरो दौग दोगानि मे घुसतै
शहरी बाबू जैकेट किनता
गरीब किसान थर थर कंपतै
प्रमोद कुमार पांडिचेरी
23-10-2019
Comments
Post a Comment