वरदान (हिन्दी कविता)
वरदान
हाथ पसार खड़ा था कब से
हे दाता कुछ ऐसा दे दे
धन्य हमारा हो जाये जीवन
मन मंदिर में उल्लास भर दे।
दाता ने है सुनी हमारी
बना नाना मान दिया है
मन का मयूर नाचा देखो
ऐसा वर हमको दिया है।
दूर कहीं एक बड़े शहर में
है एक छोटा अंकुर मुसकाया
नन्हें नन्हें हाथ हैं उसके
उतनी ही है छोटी काया।
आंखें मूंद मुस्काता है जब
लगता ईश से बातें करता
आंख खोल जब जगत निहारे
प्रश्न भरे होते हैं सारे
अभी कपाल छोटा है लेकिन
आभा कितनी फैली पसरी
खुद तो चुप चुप ही रहता है
सबको बाचाल बना रखा है।
रूप तो उनके ऐसे जैसे
स्वयं देवदूत ही आये हैं
एकटक हमें देखे जाते थे
मैं विभोर हुआ जाता था!
मुस्की छूटी बातें हो गईं
नाना घोड़ा चढ़ने आऊंगा
तुझे चढ़ा कर घोड़ा अपनी
धन्य भाग्य हो जाऊंगा।
शतायु बनें और स्वस्थ रहें
श्रुति सम आप विद्वान बनें
मात पिता कुल मान बढ़ाकर
सम्पूर्ण राष्ट्र का गौरव बनें!
(एक नाना का अपने छोटू छोटू प्यारू प्यारू नाती को शुभाशीष के साथ भेंट)
डॉ. प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,13—01-2020
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