भिख मंगनी (मैथिली बीहनि कथा)

भिखमंगनी 
        (मैथिली बीहनि कथा) 

बौवा रौ !!
की मां? की कहै छैं? 
तोरा ऊ बुढिया याद छौ? 
कोन बुढ़िया? बौवा रौ वैह जेकरा तों एक दिन बड्ड फजहैत कैने रही। 
के? ऊ भिखमंगनी! फेर तूं ओकर नाम लै छैं। कहि देने छियौ ने! ओकरा तों द्वार पर टप’ नहिं दिहैं। 
मुदा तों छैं दानी मैंयां।  जै दू बेर मैंयां मैंयां कहलकौ कि... लिय’ खा लिय ‘!कपड़ा लिय ‘रुपैया लिय ‘!
चुप ने ! कत्ते बजबैं! “आब ऊ नहिं अओतहु”। से कियै। डेरा गेलै! 
“सुन ने! हम जनै छियै। तों उपरे सं एना छैं। तोहर छाती मोम छौ। “माय कहलखिन। 
हे !बाऊ! अपन दोस सब के संग क’ ले। देखही बाड़ी मे आमक झांखी आ गोटना सब छै। सभ मिल उठा लै जाइजो। ले ई रुपैया ल’ ले! बजार सं नबका साड़ी कीन लिहैं। ओकरा देह पर लपैट दिहै। ऊ बुढ़िया जे नित्ये भोरे भोर दुरखा मे बैसि “मैलकाइन  मैलकाइन” करै छलै ओकरा भगवान उठा लेलखिन! आब हम ककरा सं दू टिप बातो करब! 
बाऊ ने। नहिं नईं कहू। अहां ओकरा ओहि दिन भगा देलियै आ प्राते भेने आवि क’ हमरा कहलक, “ बौवा कत्त छथिन? भगवान हुनका औरदा देथुन्ह! अखन बच्चा छथिन तैं एना बजै छथिन। एक दिन अपने बुझि जेथिन! 
ला!  गंगाजलक बोतलो द’ दे!  जायछी। 

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास 
पांडिचेरी 01-10-2019

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