मिलन (हिन्दी कविता)
मिलन
मैं इस पार खड़ा
तुम उस पार प्रिये
बीच में बहती धारा प्रबल
मेरी दृष्टि तुम पे गड़ी
तेरी भी मुझपर अड़ी
धूल भरी आंधी आती थी
गर्द पड़ें तेरी आंखों में
मैं तो बस अंधा बना
फिर भी पागल पग बढ़ता गया
झाड़ झांखर गड्ढे आये
बढ़ते रहे किनारों पे हम
नहीं पता क्या आया
क्या गया
पहुंच गये हम महासागर में
न देह रहा
न दृष्टि रही
आत्म से आत्म मिल गये
कैसा अपना मिलन रहा।
प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
पांडिचेरी 31-07-2019
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