अकेले की ब्यथा (हिन्दी कविता, मेरी पहली रचना)
अकेले की व्यथा
आ सखी मन की कहूँ
न मन की सुध न तन की रही
थी कली आज खिल गयी
बगिया बिच अकेली खड़ी
नटखट पवन सिहरा गया
बादल भी बूंदें गिरा गया
एक भौंरा घूम घूम कर
कानों में रस घोल गया
न जाने क्या बोल गया
आ तूं से कहूं मन की दशा
एक अकेली की व्यथा।
मित्रगण यदि अच्छा लगे तो लिखियेगा}
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