भूमि जा (मैथिली कविता)
, भूमि जा
भूमि जा गेलि पुन: भूमि समा
इ त’ कथाक दुनु छोर कहल हम
एहि बीचक जे कथा व्यथा अछि
गौरवशाली पर मार्मिक जथा।
भूमिक धिया छनि धैर्य अपार
शुभ सुगुणी धी छथि अपरम्पार
मिथिला केर सुख शांति बढ़ौलनि
मृदुल स्वभाव समभाव जगौलनि ।
पुरुषोत्तम राम सन स्वामी
पाओल मैथिली अनुगामी
अपने राम मर्यादाक सीमा
पत्नी सतीत्वक ध्वजा धारी
महल रहौ वा जंगल झाड़
रामक पाछा हरदम ठाढ़।
नहिं मलिन मुख कहियो कैल
पतियेक सुख मे सुख पायल।
जखन लंका लय गेल रावण
जागल सिय सतिक तेज प्रचंड
ज्वाला देखि थर थर कांपल
धराशायी दस मुखक घमंड।
पतिक मान कें धर्म समझि
छोड़ि देलनि रावण कें सीता
नहिं त’ ज्वाला मे सुड्डाह करि
खतम कयने रहितथि खिस्सा।
सर्वज्ञ राम लेल अग्नि परीक्षा
तखनों त्यागि पुन: वन पठौलनि
मुनि बाल्मीकि लग पाओल ठौर
पुत्र द्वय केर जन्म देलनि ओ।
धियाक छाती दु:ख दारूण सं
फाटि क’ भ गेल छिन्न -विछिन्न
चित्कार सुनि मायोक उर फाटल
भय एकाकार कयली कथाक अंत।
प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
पांडिचेरी 13-05-2019
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