आखर (मैथिली कविता)

आखर 

हे आखर! हे अणु! 
अहां त’ ब्रह्म छी,  रचै छी 
त’ ब्रह्मास्त्र कियै छी !
अहां त’ सूत्र छी, बनवै छी 
जोड़ै छियै 
त’ तोड़ै कियै छियै! 
बन्हन मे बान्है बला 
अहीं त’ मंत्र छी 
जोड़ै के मंत्र दिय’  
अहां के जोरी ,राग बनावी
जड़ चेतन के झुमावी 
गीत लिखी, पंक्ति रची 
बालक हो कि बृद्ध 
सभक भाल चमकाबी 
सब के दुलराबी 
गर्मी, जार, वर्षा, बसंत 
शिशिर हेमंत 
ऋतु सभक सुर बनि जाइ 
दुलरावी, हिलरावी 
युवा, युवती केर उर मे पैस 
धड़की, इतराई , ईठलाइ
कखनों कोमल, कखनों निर्मल 
कखनों चंचल बनि 
हुनकर नयन मे घुसि लजाइ 
सभक जिह्वा पर बैस 
ठोर के सहलावी, मुस्काइ 
मायक ममता, पिताक दुलार 
भाय -बहिनक पुचकार 
दादा-दादी, नाना -नानिक 
खिस्सा मे अहां केर बैसाबी 
लोरी बनाबी 
अत: हे आखर!  अहां त’ 
अजश्र छी, अजर छी, अमर छी
रचनाक मंत्र रहब 
विनाशक मंत्र बनि 
संहार नहिं करब!!! 

प्रमोद कुमार, पांडिचेरी 

13-09-2019

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