योग:एक अद्भुत वेद (हिन्दी कविता)

योग :एक अद्भुत वेद 

भारत योग  की भूमि  अपनी 
तोड़ नहीं, योग  सिखाती  है
तन  को जोड़ें  मन  से   कैसे 
स्वस्थ रहें गुड़ सिखलाती है। 
             पहले   तन  को  जोड़े  मन से 
             फिर मन को आदि ओ अंत से
             उड़ जाये  मन  जहां चाहे वह 
              तब  भी बंधा  रहता  जड़ से 
शीत से कांपा  जला  धूप  में 
भीख   में   भोजन   पाते   थे
दिन भर साधना लीन रहे वो 
ऐसे  साधु  अपने  पूर्वज  थे। 
        लड़ें  तिमिर  से,  वेद  दिया   है
        शत्रु ध्वंस को ब्रह्मास्त्र दिया है
       स्वस्थ  रहने  को योग  दिया है
       भू, नभ मिलन का मंत्र  दिया है। 

डॉ. प्रमोद कुमार 
पांडिचेरी, 21-06-2019

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