अक्षर बन आऊं धरती पर (हिन्दी कविता)



अक्षर  बनकर  आऊं  धरती  पर
          शब्द  बनूं  और  अर्थ  धरूं फिर
पन्ना  दर   पन्ना  बढ़ता  जाऊं
         बन पुस्तक,  और फिर  लग जाऊं ।

हर  अक्षर  एक  दीप  बने  प्रभु !
        जैसे   नभ  में  तारों  की लड़ियां
लड़ी  दर  लड़ी  घरों  में टंग कर 
          घनघोर  तिमिर  को  दूर  भगाऊं ।

कण  कण  बादल  जल  पीता  है
         फिर  कर  प्रयत्न  अम्बर चढ़ता है
जहां  भी  हरियाली   जलता  देखे
           बूंद   बूंद  फिर  बरस   जाता  है ।

लेती   अंगराई   जीवन  फिर  से
         रिक्त  नीरद   मिलता  अर्णव  से
फिर   से   अपना   रूप  सजाता
         कर्तव्य  पथ  पर  आगे बढ़ जाता ।

प्रकाश   पुंज   न  बनना  मुझको
         बिम्ब  बिम्ब  ही  रखना  प्रभु मेरे
जहां   तिमिर  की  कालिख  फैले
        मैं दौड़   वहीं  जा   टिम    टिमाऊं !

मुक्ति  की  चाह मुझे नहिं प्रभु जी
        जनम   जनम   यही  करता जाऊं
प्रभु ! जबतक तेरी  रचना  भू  पर
     बन  बादल जल  भरूं  और बरसाऊं।

डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी, 24-04-2020

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