बेचैनी आ भूत (मैथिली कविता)
बेचैनी आ भूत
नीन नहिं होइ छल
जं कनि आंखि मुनै'
कि नाटक शुरु
जेना पापक मोटरी खुलि जाय!
हीं हीं हीं,
हम छी भूत
आइ हम देखेबौ तोरा
तोरे करामात
ओहिना अईंठबौ
जेना तों सबके अईंठलिही!
माय' गे माय'
आइ बचा ले
आइ बकसि दे भाई!
आंखि खुजल
पड़ैल ओ!
फेर आंखि झपकल
हा हा हा ! हू हू हू!!!
हम परेत!!!
आइ तोरा तारक गाछ पर
लटका क' झुलेबौ
जेना तों सबके लटकेलही, झुलेलही
बाबू यौ बाबू
बचा लिय' आइ
भागल प्रेत!
आईं!!! स्मशान मे छी हम!
कोना अएलहुं
पाप अनलकहु!
नकिया क' क्यो बाजल
याईं याईं याईं!!!
हम छी जिन्न!!
आइ तोहर बोली हरबौ
जेना तों नहिं केकरो बाजय देलही!
खूब खेखनलहुं!
हाथ पैर धेलियै
कहलक आवो सुधरि जो
ई त' रिहर्सल
नहिं त'
सत्ते मे अएबौ
जोर सं घिघियेलहुं
पत्नी ठेल क' उठा देलथि
अहां एत' सुतू
हम दोसर बिछौन पर जाइछी!!
आइ ज्ञान भेल
अहिना सभ छोड़ैत जैत
एक दिन बिछौन पर एसगरे
चारू दिश
भूत,प्रेत आ जिन्न!
ज्वाला देखि
थपरी बजैत!!!
प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,12-12+2019
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