सरोगेट बच्चा (मैथिली बीहनि कथा)

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                                                                      (बीहनि कथा) 
कामिनी के वियाह भेना दस साल सं बेसिये भ’ गेलै। एगो अमेरिकन कंपनी मे पैघ ईंजीनियर आ’ घरोवला तेहने। सासुर बड़ पढ़ल लिखल आ’ समृद्ध। कामिनी आ ओकर घरवला देखै मे एकदम गोर -नार। मुदा संतानक सुख नहिं भेटलै। डाक्टर वैद्य सं हारि परिवार मे निर्णय भेलै जे सरोगेसीक (दोसरक कोख उधार लेनाइ) विधि अपनायल जाय। 
बंगलौर मे परिवारक एकटा घनिष्ठ मित्र बड़ पैघ डाक्टर छलखिन्ह, हुनके सं परामर्श क’ सभटा निर्धारित कैल गेलै। समय बितलै। खबरि अएलै जे लड़का भेलैया’। आनंदे आनंद। जेना खुशिक लहैर पसैर गेलै सगरो। 
पंडित कहलखिन्ह जे परसू बच्चा के देखल जाय। एखन नीक लग्न नहिं छै।  
आव सभ गोटे छटपटाय लागल।  
समाधान दादा निकाललखिन।  कोनों बात नहिं। जखन भगवान पौत्र रत्न देलैथ त’ अवश्ये निक लग्न आ दिन मे घर अनबनि। तावे हुनका लै कपड़ा-लत्ता, खेलौना आदिक व्यवस्था करै जाउ। 
दादी कहलखिन्ह, “हम त’ मुंह देखाई मे सोनाक चेन देवै।“
नहिं नहिं, “हम त’ हीराक...... “!बिच्चे मे ससुरक बात लोकैत कामिनी बजलिह, “हीराक हार त हम देवै “! अहां किछ आर दियौ। 
एवं प्रकारें दू दिन कोना बित गेलै से केकरो पतो नहिं चललै। 
आई भोरे -भोर सभ नहा धो क’ बच्चा के लाव’ चललाह। बिचार भेलै जे सभ सं पहिने दादी ओकरा कोरा मे लेथिन। 
बच्चा के कोरा मे लेने दादी बाहर ऐलखिन्ह त’ हुनक मोन मिझैल सनक देखि सभ पूछ’ लगलैन्हि, “की भेलै! हिनकर मोन एना कियै भेल छैन्ह? “
दादी बच्चा के कामिनिक कोरा मे दैत बजलिह, “लियह अपन बच्चा। कारी खटखट! हमरा कुलक कलंक! “
सभ मुंह तकिते रहि गेल! 
प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “
पांडिचेरी, 16-03-2019


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