पूजा ( हिन्दी कविता)
पूजा
पूजता हूं तुमको नित दिन
दिल में कहीं छिपाकर
मंदिर मस्जिद नहीं भटकता
हाथों में दिया जलाकर।
आखर में आखर जोड़ता
दीप में बाती छोड़ता
लौ लगाता, प्रकाश फैलता
मुझे पूजा किया सा लगता ।
हे अम्बे! हे पिता !
करता , तेरा ही तुझे समर्पित
न मैं अपना, न मेरा अपना
देता वही , जो तूने दिया
मेरा क्या जाता आता।
बस इतनी दया तू करना माते
जिसमें लगाया, लगाये रखना
सांस तो टूटेगी ही एक दिन
हाथ में दिया थमाये रखना
दाता ज्ञान का बनाये रखना।
प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
पांडिचेरी 30-09-2019
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