मेला (मैथिली कविता)

मेला 

पहिर पैजामा बौवा चलला 
देखैला’ आइ मेला 
जेब मे  छलैन्हैं छेद कनिटा 
धन्य जे भेटलन्हि  टाका 
कनपट्टी सं तेल चुबै छनि 
चुड़की तैयो लटकल 
दौड़ दौड़ अपसियांत भेल छथि 
के सभ संग संग चलत! 
दसटा बच्चा निकलि पड़ल छथि 
टाका कैंचा संगें
किनको पैंट ससैर रहल छन्हि 
मुनमाक बांहीं छोट 
किनको जुत्ता ढील ढाल त'
रमुआक चप्पल बेजोड़ 
किनको नाक सं पाइन बहै छनि 
किनको सब छैन्ह ठीक। 
शम्भू झुलै छथि झूला पर आ
शंकर खरिदलथि गुड्डी लटाई 
छोटका नवीन गेला छिछलौवा पर त'
पैंटे गेलनि ससैर 
लोक सब त’ हंस’ लगलै 
काइन देला नवीन। 
क्यो खरिदलक पिपही, गाड़ी 
क्यो खरिदलक औंठी 
ककरो माय के याद एलै त’ 
खरीद लेलकै चोटी। 
भरत गेलै जादू देखय 
मुरली देखलक बाघ 
बाघ गरजलै मूरी घुमा क'
मुरली के लगलै लग्घी 
हो हो कय क’ परायल बच्चा 
भय गेलै आव छुट्टी। 
लड्डू पेड़ा कचरी मुरही 
खरीद क' सबकोइ खयलाह
सांझ होइत सब घर पहुंचला 
सोर भेलै बड़ भारी 
क्यो बजबैया पिपही पीं 
त क्यो फूकैया सीटी सीं 
ककरो कटही गाड़ी खड़ खड़ 
ककरो बजैछै मोटर पों
सब बच्चा के खुश देख क'
हमरो होइया, हमहूं मेला जैतहुं। 

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
 पांडिचेरी 02-08-201

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