शहर मे छी (मैथिली कविता)
शहर मे छी
शहर मे छी
मर्यादा पालन कय रहल छी
एसगर छी
पत्नी आन ठाम गेल छथि
चारि दिन सं , सांझ क’
लोक पर लोक
पुइछ जाइत छथि
कोनों दिक्कत हुए त’ कहब
पूछ’ पड़ैया ,चाह पीवै
ठीक छै, पुछै छी त’ पी लेवै
मुदा हे!
हमरा लै हाफ चिन्नी आ
हिनका लै नो चिन्नी !
बुझल ने!
आइ त’ हदे भ’ गेल
झुन्नू बाबू आवि धमकलाह
नहिं बुझलियै
भोरे नुनू बाबू कहलाह जे
अहां एसगरे छी
पत्नी के नहिं रहल गेलैन्ह
कहली घर खालिये छैन्ह
चलू ने घुमियो लेब
आ किछ मददो कय देबन्हि
बेचारा प्रोफेसर साहेब!
परिणाम!
क्षणें क्षणें चाह,पूरी पकवान
हाथ झड़ैक गेल
हे बरनॉल लगा लेब!
घूमय गेलाहै
हमरे कार सं
कहि गेला अछि
अहां चिकेन बड बढ़ियां बनबै छी
हम सब सांझ तक अबै छी
पोलाव पर चिकेन फ्री
हा हा हा, ही ही ही!
प्रमोद कुमार पांडिचेरी
19-11-2019
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