जन्मांध (हिन्दी लघु कथा)

               
( हिन्दी लघु कथा)

चन्द्र भूषण जन्म से ही अंधा है। मां-पिता का इकलौता । स्कूल तो जाता है लेकिन मां उसे घर पर खूब पढाती । चन्दू को क्या नहीं मालूम। पिताजी आफिस से आकर अखवार पढ़कर सुनाते। चन्दू ध्यान लगाकर सब सुनता। मां उसे आई ए एस बनायेगी। पिता भी सहमत हैं। चन्दू की बुद्धि के तो सभी कायल हैं ही उसके स्वभाव से बड़े दादा बहुत खुश रहते हैं। दरवाजे पर आते ही सबसे पहले चन्दू से ही बात चित करते हैं। बड़े दादा अस्सी पार कर चुके हैं। लाठी लेकर चलते हैं। दूर से ही लाठी की ठक ठक सुनाई देती है। 
दरवाजे पर दो कुर्सियां थीं। एक पर सदा की भांति चन्दू बैठा ब्रेल लिपि की अपनी किताब पढ़ रहा था और दूसरी पर महेंद्र बैठा था। बड़े दादा के लाठी की खट खट सुनाई देने लगी। चन्दू ने महेंद्र से कहा,” तूं कहीं और बैठ! दादा आ रहे हैं। यह उनकी कुर्सी है। वह बैठेंगे। लेकिन वार वार कहने के बाद भी महेंद्र नहीं उठा। चन्दू ने अपनी कुर्सी दादा को दे दी। दादा नहीं बैठ रहे थे लेकिन चन्दू के बहुत आग्रह करने पर बैठ गये। 
पन्द्रह वर्ष बीत गये! चन्दू राज्य स्तरीय प्रशासनिक सेवा में सफलता पाकर बड़ा अधिकारी है। संयोग से आज महेंद्र को चन्दू का अर्दली बनाकर पोस्टिंग हुई। चन्दू ने उसे बैठने के लिए कहा । लेकिन महेंद्र नहीं बैठा। बस इतना बोल पाया, “ काश उस दिन हमने बड़े दादा को बैठने के लिए कुर्सी दी होती!”

डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,27-6-2020

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