चन्द्रकला (हिन्दी लघु कथा)
चन्द्रकला
(लघुकथा)
चुन्नी बाबू के घुठने से खून रिस रहा था। अपने गंदे, चीकट और फटी धोती से पोंछने की असम्भव कोशिश कर रहे थे। जाड़े की ऋतु थी। शाम जल्दी घिर आती थी। साधारण सा स्थानीय बाजार है राजनगर। यहां कभी दरभंगा महाराज रहा करते थे। इस बाजार की खासियत थी यहां के हलवाइयों द्वारा बनायी गयी मिठाइयां। राजा के पसंद की बेमिसाल मिठाइयां बनाते थे। ‘चन्द्रकला ‘उनमें से एक था। चन्द्रमा जैसा गोल। चमकीला केसरिया रंग। खोवा और मेवों से ठूस ठूस कर भरा और फिर गाढ़ी चासनी में डुबोया। स्वाद के क्या कहने। किसके जीभ से पानी न गिरने लगे! चालीस वर्ष पहले पांच रुपये का एक मिलता था। इसीलिए कुछ लोगों ने इसका नाम ही ‘खुनियां ‘मिठाई रख दिया था।
बाजार के शुरु में ही एक पुल है। वहीं पर सन्ता की मिठाई, घुघनी, मुरही की दुकान थी। चुन्नी बाबू कब से वकोध्यानम् हो उसी दुकान के सामने खड़े थे। दुकान में लोग आते और अपनी इच्छानुसार खाकर चल देते। लेकिन चुन्नी बाबू बिना हिले डुले कब से वहीं खड़े थे। इलाके के लोग उन्हें अच्छी तरह जानते थे। उस इलाके के वह अति सम्पन्न गृहस्थों में जाने जाते थे। मगर जितने ही सम्पन्न उतने ही कंजूस। पता नहीं आज क्या हुआ। चन्द्रकला खाने की बहुत तीब्र इच्छा जागी। एकटक दुकान के तरफ ही देखते रहे। अनेक जान-पहचान के लोग आये, चन्द्रकला खाकर चल दिये। प्रभाकर की नयी नयी नौकरी लगी थी। दोस्त खींचकर उसे सन्ता के दुकान तक ले आये और चन्द्रकला का आन्नद उठाने लगे और चुन्नी बाबू को चिढाने लगे। प्रवीण ट्युशन पढाकर अव पुल के पास पहुंच चुका था। दो मिनट के लिए बिजली गुल हुई और वापस आ गई थी। दस -पन्द्रह लोगों को एक जगह खड़ा होकर हो हल्ला करते देख प्रवीण की जिज्ञासा जागी और वह भीड़ के पास पहुंचा। उसको वहां का दृश्य देखकर विश्वास नहीं हुआ। जोर से चिल्लाया, “अरे ये क्या करते हो तुमलोग! जानते नहीं यह चुन्नी बाबू हैं! ईलाके के सबसे धनी व्यक्ति। “
“तो क्या “ कोइ दूसरा चिल्लाया। “चन्द्रकला चुराने में इन्हें थोड़ा भी शर्म नहीं आयी । खरीद कर खाते नहीं, चोरी करने चले हैं! “ऐसी धन सम्पत्ति किस काम की “कोइ और बोला। धीरे -धीरे भीड़ छंट गई। प्रवीण ने उन्हें सम्हाल कर घर तक पहुंचा दिया।
रात भर चुन्नी बाबू बेचैनी में छटपटाते रहे। नींद का नामोनिशान नहीं था। कौन चीज की कमी है। सैकड़ों मन आनाज सड़ रहे हैं। बैंक में भी लाखों रुपये ऐसे ही पड़े हैं। दो कौडी का सन्ता हमें मारेगा। ठहर कल तुम्हारी खबर लेता हूं।
सुबह हुई। हरवाहा मोहना आया। खुशी से उसका मुँह चमक रहा था। “क्या बात है मोहना बड़े खुश लग रहे हो “?
मेरी बेटी का आज छठी है। शाम में भोज दूंगा। आप आएँगे न मालिक। देखुंगा, “चुन्नी बाबू ने कहा। “ नाम क्या रखा है, उन्होंने फिर पूछा। “चन्द्रकला ‘!
नाम बदल दो या काम छोड़ दो। चुन्नी बाबू ने फैसला सुना दिया।
प्रमोद कुमार
पांडिचेरी
Comments
Post a Comment