अंत (मैथिली बीहनि कथा)
अंत
(मैथिली बीहनि कथा)
घोघ काढ़ने धरणी बाबुक कनिञां सेठ जीक गहना जेबरक दोकानक कोनटा लग ठाढ़ छलखिन। सांझक आठ बजैत रहै। लगनक दिन बित गेल रहै । गोटैके आधे बन्हकी बला गहिंकी बैसल रहै। सेठ जी गल्ला मे सं पचास टका निकालि एगो कर्मचारी दिया धरणी बाबुक कनिञां के दऽ देलखिन। समान बेसाहि ओ घर गेली। ई नित्येक क्रम भऽ गेल रहै।
धरणी बाबू गरीब छलाह मुदा दयाक साक्षात मूर्ति। सांझ मे दोकान सं निकलथि आ जं क्यो किछु मांगि देलकनि त आगू पाछू नहिं देख जे रहै छलनि सब दान कय दैत छलखिन। कतोक दिन बाल बच्चा सहित अपनों भुखले रहि जाथि। तहिं सेठ के कहि हुनकर कनिञां पैसा लेब' आबय लगलखिन।
बजार मे सड़कक काते काते तरकारी वाली सब बैसै छलै। वापस जाइ काल धरणी बाबू कहियो मूर त कहियो पकलाहा परोड़ ओकरा सब सं लगभग मुफ्ते मे खरीद लै छलखिन। मंगली त' नित्यहि बंचलाहा तरकारी द दैन । ईहो जेबी झारि क' द' दैत छलखिन । आइ की भेलै? मंगली कहां ? पुछलखिन त' ज्ञात भेलैन्ह जे ओ बड्ड जोड़ बिमार छै । पैर ओकरे घर दिश घुमि गेलैन्ह।
मंगली कुहैर क' कहलकैन्ह ,” मुंशी जी पचास टा टाका दिय' । दबाई मंगैब । किछु क्षण धरणी बाबू शांत रहलाह। खाली जेबक टीस उठलैन। फेर पाछां मुरि गेलाह । लतमारा पर पैर पिछरि गेलैन। की भेलै? किछु नहिं ! अंत !!!
डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,14-3-2020
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