बाबा ( मैथिली लघु कथा)

                                                                

तिरपित एखन साते आठ बर्षक रहै। असल नाम त’ छै तृप्ति, मुदा घिचाइत तिराइत आव सभ ओकरा तिरपिते कहै छै। बाबा त’ हरदम जोर सं चिकरै छथिन्ह ‘तिरपितवा । कोनो -कोनो बदमसवा छौंरा सभ ‘तरिपीवो'‘ कहि दै छै। !छरहर देह,माय’ कहै छथिन जे ओकर रंग ललका गोराइ लेने छै,मुदा असल मे ओ पिंडश्याम छै। पिताजी एकटा निक हाई स्कूल मे शिक्षक छथिन्ह । ओकर जेठ भाइ सभ पिताजिक संग रहि पढ़ै छथिन्ह। ओहो कहियो -कहियो पिताजिक संगें चलि जाइत अछि मुदा ओत्त ओकर मोन नहिं लगै छै। गामे मे रहि जाइत अछि। भरि दिन रणे वने बौआइत। भूख लगै त’ घर आवै। धूरा माइट सं देह पोतैल। डेंग पकरि क’ माय कोनो तरहें तेल कुर लगा दै छलखिन्ह। आ दोसरे दिन बाबा इसकूल मे ल जाक’ पहुंचा दै छलखिन। ओत्तहु ओकरा मोन कहां लगै छलै। बाबा किदन कहां हुट्ठा,पौना , त’ सवैया पढ़वै छलखिन। नीक त’ नहिं लगै मुदा झट द’ यादो भ’ जाई। बाबा  बड़ खुश। शनिचरी लई काल ओकरा माय’ के कहथिन, “ई छौंरा एक दिन  पैघ आदमी बनत”! मुंह पर त’ किछु नहिं कहथिन्ह, मुदा बाबा के जाइते बड़बड़ै लगथिन्ह, “भैर दिन त’ रणे-वणे बौवाइत रहै छै आ’ बड़का आदमी बनतई!”
                                  आब तिरपित दसवां मे पढ़ैया। छरहर शरीर। मुंह सभ चिक्कन -चुनमुन। कतहु कतहु दाढ़ी -मोंछक पम्ही देखाय लगलै या’! गामे के हाई ईसकूल मे पढ़ैत अछि। कोनो मास्टरक त’ आंखिक तारा त’किनको लेल बुड़लेल। खेलक्कर नम्बर एक! कबड्डी, पिट्टो, स’ ल’क’ क्रिकेट, बैडमिन्टन, भौलीवॉल, फुटवाल, किच्छो छुटल नहिं। तैं कहियो क्लास मे फस्ट आ’ कहियो टाईं टाईं फिस्स!  मुदा छौंड़ा सभक हीरो। बानरी सेनाक सेनापति। 
                                    आइ चारु दिश गहमा -गहमी छै। तिरपित के भैयाक बरियाती जा रहल छै। किछु गोटे ट्रेन सं जेथिन । समान सभ आ किछु छौंड़ा सभ टैर गाड़ी सं जेतै।  सैह निर्णय भेलै। तिरपित के पिताजिक दोस्त अपन टैर गाड़ी देलखिन्ह अछि। बड़द सभ! बाप रे बाप! पहाड़ सन सन। टैर गाड़िक पिछला हिस्सा चलै काल सड़क सं सैट सैट जाइ। बड़द सभ जेना जोश मे रहे, दौड़ते  चलै। ट्रेनक रस्ता घुमान रहै।  राजनगर सं सकरी आ फेर निर्मल्ली बला लाइन। तैं समय कनि बेसी लगै। सोझक रस्ता मात्र तीन कोस। तहि पर सं दंतार सनक बड़द! बजनियों सभ संग भ’ गेलै। बाबा के की फुरेलनि, ओहो संग भ' गेलखिन्ह। तिरपित के ओकर बाबू किछु रुपैया बट खर्चा लै देलखिन्ह। तिरपित त’ फुइल क’ कुप्पा। बजनियां, बाबा आ छौंड़ा सभ के लगा क’ बीस गोटे लगभग। 
                                    टैर गाड़ी चलि देलकै। चलै की, बुझु जे दौड़े। छौंड़ा सभ पिक्की पारैया’! बहलमानों के मोन लगै। बड़दक नांगरि पर हाथ देलकै नहिं कि बड़द बमकल। दौड’ लगै। टैरगाड़ी जखन गामक सीमा टपि पचदही पहुंचलै त’ रस्ते कात मे पासिखाना रहै। बजनियां सभ रुकि क’ पिय' लागल। बाबा सेहो संग भ’ गेलखिन्ह। तिरपित मना करिते रहि गेलै मुदा के मानैया’! तिरपितो गरमैल। हौ बहलमान, “हांक’ जोर स” कहै के देरी कि गाड़ी दौड़’ लागल। छौंड़ा सभ हो ..हो ..हा... हा, क’ अनघोल मंचेने अछि आ एमहर बजनियां सभ आ बाबा ताड़ी पिवै मे मस्त। जखन गाड़ी अंदाजन आधा किलोमीटर गेल होयतैक कि एकटा बजनियां के ध्यान ओमहर गेलै। ओसभ ताड़ी पिनाइ छोरि दौड़’ लागल, आ चिकरितो जाय, यौ बौवा गाड़ी रोकू! हे यौ तिरपित बाबू, “गाड़ी रोकू “
बाबा सेहो दौड़थि आ’ चिकरवो करथिन्ह, “हे रौ तिरपित! गाड़ी रोक! 
एमहर तिरपित, बहलमान आ आरो सब बच्चा सभ जेना जोश मे आवि गेल। तिरपित बहलमान के कहलकै, “और तेज कर’ गाड़ी।। आव बुझथु ताड़ी पिवै के मजा! “गाड़ी त' जेना उड़' लगलै। होड़ लागि गेलै। आगू आगू गाड़ी दौड़ैया आ पाछू पाछू बजनियां सभक संग बाबा। बाबा कखनों लटपटा क' खसथिन आ उठि क' चिकरथिन, “ रौ तिरपित गाड़ी रोक…. हे कल जोरै छियौ “ इ कहि बाबा सचमुच कल जोड़ि ठाढ़ भ' गेलाह। दोसरे क्षण मुर्छित भय खसि पड़लखिन। आव त' तिरपित के मोन सुन्न! डरे हृदय कांपि उठलै। तुरत गाड़ी रोकबा, दू चारि छौंरा सभक संग दौड़ल। बाबा के मुंह सं लेर चुबैत रहनि। मुंह पर पानि छिटल गेल, गमछा स' हवा कैल गेल तखन कनि कालक बाद ओ स्वस्थ भेला। एकाएक तिरपित हुनकर पैर पर खसि पड़लै। बाबा अपन हाथ ओकर माथ पर राखि देलखिन। टैर गाड़ी चलि पड़ल।
डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी।
                 
       
            

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