गरु वंदना (मैथिली कविता)

गुरु वंदना 

हम अबोध आन्हर अज्ञानी माटिक  लोथ  अष्टावक्र जानी 
कहथि मातु-पितु प्रथम गुरु सेबू तखनहिं उतरब  वैतरणी। 
जहिना  कुम्हार  वासन  बनवैया   मूर्तिकार   मूर्ति   गढ़ैया 
बनि सोनार माला बना क’ प्रभु के गला लगा दिय  स्वामी। 

मुख प्रभाकर प्रभा चन्द्र  सन प्रखर अनंत  नक्षत्र दमकैया 
अष्ट सिद्धिनौ निधिके स्वामी गुरु महान अहां त अन्तर्यामी 
दिशा  हीन  हम ढ़ंगरि  रहल  छी  ठाम  नहिं कोनो सुझैया 
करुणा  के  सागर  गुरु श्रेष्ठ   हे कृपा  लय  मोन  तड़पैया 

निशि भयावनि अम्बर वारिधि दामिनिदमकि उमकि डरवैया 
मूर्ख  जानि   चमगादर   डराबै  झिंगुर  कुकुर  बेंग   खिझवैया 
दिवा  रात्रि  ठोकर  खाकय  प्रभु  मोहि  ठेहुन   शोनित  बहैया’
डेंग  पकरि  उठालिय’  गुरू मोहि चरण मे शिष्य  कलपैया'

जिनका  कृपा  भेटल  छन्हि  गुरु कें  हरियर   कंचन   बनल  छथि 
नहिं सताबनि भूचर जलचर नभचर आने चिंता क्लेष  होइत छनि 
गुरु   कृपा   पावि   पंगु   चढ़ै   पहाड़   पर    नयनहीन   सब   देखै 
हमर पथ  केर ज्ञानमय  करि चलव ओहि पर सिखा दिय  हे  गुरु। 

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
पांडिचेरी 01-08-2019

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