बगुला भगत (मैथिली लघु कथा)

बगुला भगत 
                           (लघु कथा) 

एकटा गाम मे अगले बगल दू टा पोखरि रहै। लोक सभक घर सं कनिञें हंटि क’। लोक सभ एकटाक नाम लवका पोखरि त’ दोसरक नाम पुरना पोखरि राखि देने रहै। पहिने सभ धार्मिक काज पुरने पोखरि मे होइ। लवका पोखरि बनलाक बाद सभ कर्म आव एतहि होम’ लगलै। परिणामस्वरूप पुरना पोखरि आव मखानक पात सं आच्छादित भ’ गेलई। महार त’ बुझु जे सार्वजनिक शौचालय। 
                        पुरना पोखरिक महार पर एकटा तेतरिक गाछ पर एगो बगुला परिवार रहैत रहय। माता -पिता आ दू टा पुत्र। माता -पिता स्वर्ग सिधारलखिन्ह आ’ दुनू भाई अनाथ भ’ गेलाह। बड़का भाई नीक अभिभावक जकां छोटका सं पुछलखिन्ह, “ बाजह! कोन पोखरि लेबह? “पुरना कि लवका। छोट भाई एक दिनक मोहलत ल’ लेलक। घुमि घुमि क’ दुनू पोखरिक अध्ययन कैलक।  ऊंह! पुरना पोखरि! मखानक पात सं छारल आ ताहि पर सं सार्वजनिक शौचा…! लवका पोखरि त’ कतेक साफ सुथरा! रंग -बिरंग के लोक सभ नहाय अवैत अछि, बच्चा सभ चुभकैया’ ! मल्लाह जीरा देने छै ! भोजनों अफरात ! एहन सुन्नर पोखरि आर कोन होयत ! हम त’  अपन हिस्सा मे लवके पोखरि लेव। एतेक सोचैत, मोन मे लड्डू फोरैत जा क’  अपन भाय’ के अपन निर्णय सुना देलकै। 
                       छोटका भाय के त उत्साहक कोनो सीमा नहिं। लवका पोखरिक महार पर एकटा आमक गाछ पर खूब नीक घोंसला बनौलक। थोड़वे दिन मे अनेको मित्र बना लेलक। रंग-विरंगक गप-सप, घुमनाई -फिरनाई! जीवन मे प्रथम वेर लगलै जेना सचमुच ओहो एकटा पक्षी अछि। बंधन मुक्त! स्वतंत्र। पोखरिक कात मे बैस हुल हुल करय। कखनो एमहर त’ कखनो ओमहर ताकय। शायदे कखनों एक्कोटा माछ पकराई। बेसी दिन निराहारे रहि जाय पड़ै। बगले के ठूंठ सीसो गाछ पर एगो बूढ़ गिद्ध रहैत छलै। ओकर बेटा -बेटी सभ ओकरा खाइलै जे किछु द’ जाइ ,ओही मे स’ किछ कहूं बचलाहा -खुचलाहा खा क’ननिर्वाह करै।  एकदिन गिद्धक बेटा  धमकेलकै आ’ ई जान-प्राण ल’क’ भागल। जाह जाह! बड  एलाहै धमकवै बला! अखाद्य चीज सभ खा लै छी। बुढ़वा गिद्ध के त’  उपकारे क’ दइ छियै ने!  नहिं त’ सरांध सं अपनो मरत आ औरो लोकसभके मारतै। 
                          मुदा डरे आव ओ ओतहियो गेनाइ छोड़ि देलक। हारि क ’लवका पोखरिक कात मे बैस’ लागल। मुदा आदत सं लाचार, कनि देर एकठाम बैसय, माछ नहिं पकराय कि उठि क’ दोसर ठाम चलि जाय। एवं प्रकारें दिनभरि एतय सं उरि क’  ओतय आ फेर ओतय सं एतय करैत करैत हकमि जाय बेचारा। पेट खालिक खाली। 
लाचार भय एकदिन ओ अपन भाइ सं भेंट करय गेल। छोटका भाइ त चिनहैयो मे नहिं आवय। खायर कुशल समाचारक आदान -प्रदानक बाद बड़का भाई पुछलकै, “बौवा की भेलौ? एना दुबर -पातर कियै भेल छैं? “की कहू भैया! दिन भरि पोखरिक कात मे बैसल रहैत छी।  एक्कोगो माछ नहिं पकराईयै। भुखले सांझक सांझ बितैया। आव त’ बाजलो नहिं होइत अछि। आव हमर अंते बुझु! 
नहिं नहिं! एना कतहु कोइ बाजै। “पोखरि मे माछ नहिं छै की? “बड़का भाय पुछलकै। हं माछ त’ भरल छै। उपर सं मल्लाह सभ जीड़ा सेहो दै छै। भरि पोखरि माछे माछ! 
अछा, आव बुझलहुं।  तोहर बचपन के आदत नहिं गेलौ। मोन स्थिर करय पड़तौ। एकाग्रचित्त भय माछे पर ध्यान लगौने रहय पड़तौ। कनिक्को हिल डोल नहिं। माछ बुझय जे कोनो साधु -महात्मा समाधि लगौने बैसल छथि। ओकरा तोहर डर खतम भय जेतैक। ऊ तोहर लग मे चलि अओतहु। तों टप द ‘लोल मे पकरि लिहें। तोरा बगुला नहिं, बगुला भगत बनय पड़तहु। चल हम देखा दैत छियौ। 

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास 
पांडिचेरी 15-06--2019

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