गदहा बिका गेलै (मैथिली कविता)
गदहा बिका गेलई
पौरकां साल बिकायल रहै
एकटा हाथी सन के गदहा
पेट फुलल छलै ढ़ोल जकां आ
रहै बड़का गलफुचका।
भाग्य केहेन छलै से आगू कहब
पहिले बात त’ हमर सुनू
जोरि तोरि क डिग्री भेटलै
जेना तेना क नौकड़ी
बापक घर द्वार बिकेलै
खेलकै रोजे मुर्गा।
बीस लाख सं कनियों नहिं कम
लेलकै नगदी टाका
वर -वरियातिक खर्चा लेलकै
आ लेलकइ चारि टा चक्का।
हनी मून लै जइतै बाली
टिकटो पहिने लेलकइ
बाप भेलै भिखमंगा पहिने
आब ससुर भ’ गेलै
कनिञां बड़ होशियार निकललै
कैस देलकै सब पेंच
दस दस लाख वापस करौलकै
बाबू ससुर समेंत
मुर्गा मुर्गी बंद भ गेलै
भोर सांझ क जिम
एक्के साल मे हाथी बाबू
भ’ गेला स्लिम आ ट्रिम।
प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
पांडिचेरी 03-08-2019
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