मेरी प्यास बुझाता चल (हिन्दी कविता)

मेरी प्यास बुझाता चल

मधुर मधुर धुन गाता चल
मेरी प्यास बुझाता चल
नदी झील झरनों में खोजूं
खोजूं झाड़ झंखारों के नीचे
बहते बयार के अंदर खोजूं
या तुहिन के चट्टानों में
कहां प्राण छिपा रखी है 
पूछूं जलते अंगारों से
क्यों मेरे प्राणों के दुश्मन
सभी बन बैठे बाजारों में
मैं धरा धू धू जलती हूं
कभी कीट के प्रकोप से
या फिर विषैले वाणों से
एक मैं दूजा नहीं कोई
जीवन धारणी गंग व्योम में
अव हे अदृष्य! हे विशाल!
आंखें खोल, ले संभाल
जीवन बन बरस जा फिर से
ढ़ोल पीट फिर गाता चल
मेरी प्यास बुझाता चल ।
मधुर मधुर धुन गाता चल।

डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,02-6-2020

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