मैं सुपर बाजार हूं ( हिन्दी कविता)
मैं सुपर बाजार हूं
मैं तो सुपर बाजार हूं
श्रम से निकला स्वेद बेचता
ईमानदारी की बातें
अच्छे भले संस्कार बेचता
अनुशासन वाला जीवन
शिष्टाचार उपहार में देता
और अनुभव की बातें।
दिल में पनपा प्यार बांटता
विन पैसे के भाई
बेचता दिन का सुख और चैन की रातें
और आशीष में उठी बाहें
चाहा थोड़ा दिमाग बेच लूं
बोली न लग पाई
तुम नहीं हो अच्छा बनियां
भागे सभी ग्राहक
बहुत दुखी हूं आज मित्र मैं
हारा थका बैठा हूं
सुना ईमान धरम भी बिकते
वही बेचने आऊंगा
ईमान बेचकर नाम कमाउं
और धर्म बेच ध्वजा फहराऊं
बेईमानी से धन कमाकर
सुख की नींद सो जाऊं।
पर समझ नहीं पाता हू भाई
जो बेचने नहीं है आता,
फिर वो बेचूं कैसे
धुरंधरों से लोहा
लूं तो, लूं भी कैसे
यदि आपको पता चले तो
पता मुझे बताना
उसी विद्यालय में नाम लिखाकर
अपने को मैं फिट बना लूं
ईमान धरम को बेच बाचकर
मैं भी सात जनम का जोरूं।
डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी 12-7-2020
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