नित नया रावन रचते हो (हिन्दी कविता)
नित नया रावण रचते हो
बचपन से ही नाटक में भाई
रावण ,कुम्भकर्ण मेघनाद की
विशाल पुतले बनते देखा और
अमोघ वाण के तीक्ष्ण प्रहार से
श्री राम के हाथों मरते देखा
लोगों के संग यह बालक भी
ताली पीट कर नाचा गाया
खुशी समाता नहीं था उर में
विजय पर्व मनाता आया
आज समझ आयी है बन्धु
तो प्रश्न एक मैं पूछ रहा हूं
रावण तो पापों का प्रतीक है
दुर्गुण पर सद्गुण का विजय चिन्ह है
ये सब कुछ जानकर भी
उसको खड़ा ही क्यों करते हो भाई
नित रावण को खड़ा करते हो
हड़प छीन कर खाते पीते हो
चीर हरण है रोज का धंधा
छल कपट ईर्षा ओ द्वेष का
खून ही खून बहाते रहने का
मेघ गर्जना करते रहते हो
यह नाटक कब तक चलेगा
क्या अन्दर झांककर देखा तुमने
अपने ही उर में बैठे रावण को
जबतक न उसे जलाओगे तुम
नाटक करने से क्या पाओगे तुम।
प्रमोद कुमार नेहरू
पांडिचेरी, 08-10-2019
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