ब्याह' चलला शिव हमर ( शिव रात्रि के अवसर पर विशेष) मैथिली कविता
)
जटा-जूट बिच चंद्रमा शोभय
झर झर बहैत छनि गंगक धारा
गर में सुशोभित सांपक माला
कंठ हलाहल लेलनि समाय
सौंसे भाल त्रिपुंड शोभै छनि
बिच मे छनि तेसर नेत्र समैल
कर कमंडल डमरू डम डम छै
प्रचंड त्रिशूल दियै उर कंपाय
भांग धधूर चढ़ौने शिवजी
बैसल बसहा पर छथि मुस्काइ
नाचै पाछां भूत प्रेत सभ
रंड मुंड बाघ छाल उड़ाय
विकट रुप लखि लखि सखि सभ
लंक लगा क' गेली पराय
मैना रानी मुर्छित भ' खसली
करता प्रजापति कोन उपाय
नहिं ब्याहब हम अपन धिया के
सभ के छनि वस यैह बिचार
मनहि मन मुस्काइ छथि गौड़ी
के कोना ककरा रहस्य बुझैत
बिधना रचल खेल के जानै
शिव-शक्ति के देलनि मिलाय
आशुतोष एक, दोसर कल्याणी
विश्वक भार छथि लेने उठाय
प्रमोद कुमार उर्फ" नेहरू लाल दास"
पांडिचेरी,04-03-2019
Comments
Post a Comment