शैनियां (मैथिली बीहनि कथा)

शैनियां
                         (मैथिली बीहनि कथा)

हे..! फेर ऐलहु…! पहाड़ी मूस…! आइ कि मंगतौ ? भुल्ली अपन माय के कहलकै। ताबत मे शैनियां बिचला घरक सामने बला पाया मे सटि क ' बैस रहलै। मध्यम काया, जर्जर शरीर, पिंडश्याम रंग आ मुंह मे एक्केटा दांत, सेहो उपरका मस्कुर मे। हरदम बिन बातो के मुंह फारि क' हंसै! तहिं भुल्ली आ ओकर छोट भाई अनुप ओकरा पहाड़ी मूस कहै! “ हे यै बड़की मैलकाइन! कत' छी? बाहर आउ ने!” शैनियां भुल्ली माय के सोर कैलकन्हि।
“ की कहै छी? आइ बड्ड गर्मी छै! तैं कनि आराम करै छलहु! हे यै हिनका चलल भ' गेलन्हि? दाइ सभ गे दाइ सभ! काल्हिये पुतोहु गत्तर तोड़ि क' मारने रहनि! ठाढ़ो नहिं भेल होइन्ह! आइये देखथुन्ह ! पाव भरि जमीन चलि क' अहि रौद मे आवि गेलखिन!” भुल्लिक  माय कहलखिन।
शैनियां के अपन क्यो नहिं छै। सौतिन के एकटा पोता रहै! ओहो काल कवलित भ' गेलै! ओकरे कनिञां आ एकटा पांच बर्षक कनकिरबी , सुतरी ! ओकरे संगें शैनियां रहै छलै। सुतरी के माय मनेजर साहेब के बंगला मे काज करै! जीवन कोनाहिंयों चलै छलै! बंगला मे काज करै त' होइ जे ओहो हाकिमे छै! हरदम बिन बातो के शैनियां के बात कथा कहै, मारै, पिटै!
लाबथु पैर दवा दैत छियैन्ह! शैनियां भुल्ली माय के पैर घिच' लगलै! “ नहिं नहिं! छोड़ौथ! हिनकर अपने गत्तर गत्तर टुटल छैन्ह आ हमर पैर दबबै छथि! “ कहथु , की बात छै! कियै एहन हाल मे एतेक रौद मे एलिह?
कहलियैन्ह कि जे हिनका घर में कनि जोरन हेतैन्ह!  हा..! हा...! हा...! सुतरी माय के हा...! हा...! पेट झड़ै छै...!  दही पौड़तै।  हा हा ...! तैं हम हिनका लग अएलहु! आर कतय भेटत!

प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,15-12-2019

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