गर्मी की हवा (हिन्दी कविता)

गर्मी की हवा 

ऐ   हवा  कहां  गई  तुम 
मुझको   यहां  बिठा  के
गर्मी   से   मर   रहा  मैं 
तेरा   ही    राह     देखें। 

               ऐ हवा कहां गई तुम। 

तुम  घूम  कहां  रही  हो 
जंगल  में   या  गगन  में 
धूप  में  जला हूं दिन भर 
ठंढ़क तो  कुछ  दिला  दे। 

                ऐ हवा कहां गई तुम। 

बादलों के जहां गई तुम 
बूंदों   को    ला   बुलाने 
सोचकर ही मैं  मगन हूं
जब  दोनों  साथ  आयें। 

                ऐ हवा कहां गई तुम। 

तू मंद  मंद  ही  बहना 
बूंदों  को  साथ  रखके 
कई  दिन  का जला मैं 
जाना  मुझे  जिला  के। 

                 ऐ हवा कहां गई तुम। 

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
 पांडिचेरी 16-05-2019

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